Monday, March 26, 2012

रास्ता और दूरी


एक था रास्ता 
और एक थी दूरी ...
दोनों बेसुध 
दोनों बेखबर
दोनों पागल 
एक दुसरे के लिए ...

वक्त की सतह पे 
दोनों साथ साथ
चलते थे ...
हँसते
खिलखिलाते 
ज़रा ज़रा सी बात पे खुश होते
एक दूजे के साथ
पल में खुश 
पल में दुखी
जग से परे 
हाथों में हाथ डाले 
गले में बाहें डाले
बस चलते रहते ...

प्यार में डूबे हुए 
दूरी रास्ते के बिन तय न हो पाती 
और
रास्ता दूरी के बिन भटक जाता 

अचानक ...
एक दिन न जाने
क्या हुआ 
सब बदल गया 
जाने 
किस की नज़र लग गयी 
दूरी बहुत आगे निकल गयी 
और रास्ता ..
रास्ता वही खड़ा देखता रहा
चाहते हुए भी उसे रोक नहीं पाया 
और वो बादलों को चीरती हुई
आँखों से ओझल हो गयी 
रास्ता अकेला पड़ गया 
और तभी से अकेला है 
आज तक 

लेकिन ...
आज भी 
उनका प्रेम अमर है
दुनिया में 
दोनों को 
एक साथ याद किया जाता है ...

नरेश मधुकर 

Wednesday, February 1, 2012

किधर जाऊं ...


तुझको ढूँढू कहाँ,मै किधर जाऊं
सोचता हूँ फिर उस ज़ालिम शहर जाऊं

आया न अब तक वो मोड़ मधुकर
लगता हो जहाँ दो पल ठहर जाऊं 

जिसे ओडे बड़ी शिद्दत से रोये हमतुम 
सोचता हूँ आज उस शजर जाऊं 

तेरे इंतज़ार में काट ली शामों सेहर 
तू न आया तो सोचता हूँ मर जाऊं 

अब तक तो कुछ दे न पाया तुझको 
खैर ये ग़ज़ल ही तेरे नाम कर जाऊं 


नरेश 'मधुकर'

Monday, January 23, 2012

सलीब पराये मुझे उठाने थे बहुत ...


कहने का सलीका न आया हमको  
वर्ना कहने को पास फ़साने थे बहुत

हाले दिल जब भी हमने कहना चाहा
न सुनने के उनके पास बहाने थे बहुत

न मिला वक़्त मुफलिसी में मोहब्बत के लिए
क़र्ज़ दुनिया के शायद चुकाने थे बहुत

बड़ा बेहिजाब हो हाथ छोड़ गया वो मेरा
शायद उसके पास ठिकाने थे बहुत

दर्दे दिल के लिए न मिली फुर्सत 'मधुकर'
सलीब पराये मुझे उठाने थे बहुत 

नरेश'मधुकर' 

सपने ...

सपने ...

ढेर सरे सपने

इंसान इन सपनो के पंछियों को 
सदियों अपनी पलकों पे पालता  है
इन्हें दाना डालता है
इनके लौटने का इंतज़ार करता है
सोचता है
कभी तो ये मुक्क़मिल होंगे
और वो जी भर के जीएगा
इनके साथ...
और भूल जायेगा
सारी तकलीफ
सारे गम
किस्मत कुछ और ही करती है
कुछ सपने मर जाते है
कुछ खो जाते है
कुछ धीमे पड़ जाते है
कुछ दूर निकल जाते है
फिर भी इंसान
उन्हें भूल नहीं पाता
उनका बदहवास पीछा करता है
उन्हें पकड़ने की कोशिश करता है
और चाहता है वो उनके साथ रहे
और उनके लिए सब कुछ करता है
सब कुछ ...
जो कभी उसने सोचा ही न था
एक दिन उसे लगता है शाम हो गयी है
उसकी उम्र उसका साथ नहीं दे रही
और वो इन पंछियों के साथ
बहुत दूर निकल आया है
इतनी दूर की वो अब
वहां से वापस नहीं जा सकता
न जाना चाहता है
साँसे धीमी पड़ रही है
आँखें गहरा रही है लेकिनफिर भी वो 
उन सपनो को जिंदा रखने की कोशिश में  हैं 
की काश ...
पूरे हो जाये
काश पूरे हो जाते 
वो सपने ...

Monday, January 16, 2012

बाकि उल्फत के निशाँ क्यूँ है ...


मौला जाने ये दिल परेशाँ क्यूँ  है 
बिन उसके ज़िन्दगी  वीराँ क्यूँ हैं

छोड़ जाता है सदा हमसफ़र तन्हा
हर बार मेरी वही दास्ताँ क्यूँ है   

गर करती हो मुझसे इतनी नफरत
नम आँखों में बेबस बयाँ क्यूँ है

बे हिजाब भूल गया वो सब कुछ  
दर मेरा महफिले मह्कशां क्यूँ है

पूछता है जब कोई आवारगी का सबब   
लगता मैकदा कूचा-ऐ-दिल्बराँ क्यूँ है

मिट चुका हूँ ज़िन्दगी से उसकी 'मधुकर'
फिर बाकि उल्फत के निशाँ क्यूँ है

नरेश ''मधुकर''

Sunday, January 15, 2012

रात...

रात
कितनी घनी
कितनी अकेली
गहरे काले आस्मां का आँचल ओड़े हुए
जैसे किसी का इंतज़ार करती हुई
सदियों से ...
जागती हुई
सोचती हुई
कभी कोई तो आएगा
और बाँट लेगा
सारा दर्द
सारी तन्हाई
सारे ग़म
लेकिन ...
कोई नहीं आता
भोर आते आते उसकी
हिम्मत जैसे टूट जाती है
और वो सायों की आहट सुन कर
डर जाती है

साए...
वो साए
जो भोर को अपने संग लाये है
वो भोर जो उसे नापसंद है
लेकिन फिर भी
उसके मसीहा के न आने से
वो उस भोर से समझौता कर लेती है
और समा जाती है
उस धीमे उजाले में
जो कभी उसका बैरी होता था

काश कोई समझ पाता
उस अकेली रात का दर्द ...

नरेश''मधुकर''

Wednesday, January 11, 2012

जज्बातों के रंग

प्रिय मित्रो ,

              ''जज्बात्नामा '' तीन रंगों में ढाला गया हैं जिस में जज्बातों के अलग अलग रंग है और वो रंग है ग़ज़ल , कविता और  शेर  जो ख़याल जैसे आया वैसे ही मैंने कागज़ से कह दिया इस लिए ये एक सीधी सरल भावनाओ की अभिव्यक्ति है ... वैसे तो जज्बातों का बटवारा नहीं किया जा सकता लेकिन साहित्यिक दृष्टिकोण से ये थोडा ज़रूरी लगा जो की मैंने किया हैं

पहला रंग है ग़ज़ल 
मैंने अलग अलग विषय पर अपने अंतर्मन को टटोला है और उसे शाब्दिक रूप दे कर आप की नज़र कर रहा हूँ कुछ हद तक उर्दू शब्दों का भी मैंने सहारा लिया है जिस का ज्ञान मुझे अब तक जो कुछ भी पड़ा और सुना है बस उसी तक सीमित है इसलिए मुझे बहुत अच्छा लगेगा यदि कोई मेरी किसी गलती को मेरी शैली को सुधारने के मंतव्य से मुझ तक पहुंचाएगा .

दूसरा रंग है कविता 
सरल शुद्ध भावनाओं का धरा प्रवाह है जो की  तुकबंदी और बैर जैसी लेखन कलाओं से आज़ाद है और बहते पानी की तरह है इसे महसूस करने के लिए केवल शाब्दिक ज्ञान ही नहीं आत्मा से संवेदनशील होना भी ज़रूरी है.

तीसरा रंग है शेर  
वो ख़याल है जो शब्दों के दायरे में बन्ध कर नहीं रह सकते और उसे लंबा खीचने से उस का रस नहीं रहता .कोई ऐसी बात जो बड़ी तहज़ीब से और कम शब्दों में कही गयी है जो की अपने आप में एक विषय है.

मेरे गुरु कविराज डॉ हरीश मुझसे कहते है ''लेखनी तब उठाया करो जब अन्दर से आवाज़ आये अन्यथा तुम सिर्फ शब्द लिख पाओगे और तुम्हारा लेखन लोगो को सूखे गन्ने जैसा बिना रस का लगेगा''

मैंने मेरे गुरु जी की इस बात को गाँठ बंद लिया है अब चाहे मैं सैकड़ों किताबे न लिख पाऊँ तो कोई शोभ नहीं, लिखूंगा तो तभी जब मेरी अंतरात्मा मुझे आवाज़ देगी ....
और हाँ एक बात और जो की बहुत ज़रूरी हैं मेरी नज़र में वो ये की लेखन कलाओं का यदि कहीं मैंने भावनावश होकर उल्लंघन किया हैं तो मैं आप सभी से क्षमा प्रार्थी हूँ 

ये सभी शब्द नहीं जज़्बात है जो मैंने जिए और महसूस किये है 
पल पल ...

आशा है आपको जज्बातों के ये रंग पसंद आएंगे और आप दिल से महसूस करेंगे मेरा अंतर्मन ..

सदैव आपका

नरेश''मधुकर''