आज कुछ और ही होता अगर ना तुझ से जुदा होता ,
तू ही मस्जिद तू ही मंदिर तू ही मेरा खुदा होता ...
ज़माने भर की ततबीरों का मैं सुल्तान बन जाता,
सिर्फ़ तू ही मेरी तकदीर मे जो लिखा होता...
कितनी आसान सी लगती मुझे राह-ए-ज़िंदग़ी,
तू ही मंज़िल मेरी तू ही मेरा रास्ता होता...
दीवनों के शहर मे रहता रुतबा क़ायम
तू मेरी तिश्नगी तू मेरा हौसला होता ...
न कटते अगर मेरी ख्वाइशों के पर ,
बादलों के बीच अपना आशियाँ होता .....
नरेश "मधुकर"
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