जब कोई न होगा साथ मेरे , खो जायेंगे अहसास मेरे
जब साँसे गहराने लगे , तुम खड़े रहना पास मेरे
दिखता हूँ भरा पर खाली
हूँ बिन दीपक की दिवाली हूँ
घर पूरा जगमग करता पर उजियारा न आया रास मेरे
वक़्त घटा बन जब छाया तब अपनों ने रंग दिखलाया
कौड़ी के भाव बिकने लगे जो बनते थे कभी खास मेरे
जो जीए जी लिए बचपन में आ पहुंचे अब हम
पचपन में
उम्र बड़ी और मिटते गए इक इक करके आभास
मेरे
मर्यादा की बलि चढ़े जीवन के सब उल्लास मेरे
सब बीत गया अब क्या कहना अब तो बेहतर है चुप रहना
जीवन का गीत ख़त्म हुआ पड़ गए मद्धम सब साज़ मेरे
तुम खड़े रहना पास मेरे ...
तुम खड़े रहना पास मेरे ...

No comments:
Post a Comment