Monday, September 2, 2013

बीती उमरिया ...

बिरह है कैसी , बीती उमरिया 
यादों की बारिश में ,भीगी चुनरिया 

किसी का मुझको , होने न दिया 
मुफलिसी तेरा , बड़ा शुक्रिया

मेरे बाद मुझको , ढूँढेगी दुनिया 
ऐसी कर यारा , तू भी इक दुआ 

जो मैंने न कहा , वो तुमने सुना 
इसीलिए तुझको , मैंने हमदम चुना

पथरीली रातों में ,सपना बुना
बड़ा दिल से मैंने, काम लिया ...

जय श्री कृष्ण

नरेश मधुकर

2013

Thursday, August 1, 2013

चंद अशार

कहाँ के लिए चला था ... और कहाँ आ गया 
लेखनी दादी माँ से मिली और जज़्बात हादसों से 
१६ अप्रैल १९७६ को इन हालातों के सफर में शामिल हुआ और 
आज तक संघर्ष जारी है ... पूर्वज ३ पीड़ी पहले वाराणसी से अजमेर 
आ गए थे गंगा मैया के आशीर्वाद साथ लेकर 
शिक्षा दीक्षा अजमेर में हुई ,समाज सेवा के अलावा अब तक जिंदगी में कोई 
ऐसी खास बात नहीं जो बतायी जाये.
खुद से बातें करते करते कब "जज्बात्नामा" 
कलमबद्ध हो गया पता ही नहीं चला ...
बाकी सब कुछ इन रचनाओं से बात करेंगे तो जान जायेंगे
ये मुझे अपने आप से ज्यादा जानती हैं ...


जय श्री कृष्ण 

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आयी है बेवफाई ओढकर नए नकाब 
कहीं अंजामे दिल फिर वही तो नहीं ...

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जब सब ज़रूरतों को  रखा किनारे पे मधुकर 
हुआ गुमान तब की उन्हें मेरी ज़रूरत ही नहीं ...

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अपने ही मद में फिर रहा है मधुकर 
इस ज़माने की उसे परवाह ही नहीं ..

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कैसे रोकूँ उन्हें दूर जाने से मधुकर 
लगता है अब मेरा अख्तियार ही नहीं ...

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वो बरसता रहा मेरी बेवफाई पे मधुकर 
मैं खडा सब कुछ सुनता ही रहा 

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कहते कहते वो छुओ हो जाते हैं मधुकर 
अब तक शायद उन्हें यकीन नहीं मुझ पे

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उस कमज़र्फ तबस्सुम को क्या समझूँ 
कहीं ये इजहारे मोहब्बत तो नहीं 

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कहूँ कैसे मुझे मोहब्बत है 'मधुकर' 
वो मुझको बस दोस्त समझ बैठा हैं ...

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सुबह रोज मेरी यूँ ही खुशगवार हो जाए 
यूँ ही अगर मधुकर दीदारे यार हो जाये ...

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जो भी है अब तेरा है , भीड़ भी तन्हाई भी 
पाते हैं अब सभी सज़ा, काफिर भी हरजाई भी

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मन मुताबिक़ किसी को क्या मिला हैं 
हर शख्स को इस ज़िंदगी से गिला हैं

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कर तो रहे हो मुझे तुम खुद से जुदा 
इक दिन ढूंढोगे तुम्ही मेरे निशाँ 

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अय सांझ खुद को अकेला न समझ 
कई परिंदों की राह तेरे संग बदलती हैं 

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आओ फिर उस घड़ी घूम आयें 
हैसियत से छोटे थे जब ये साये 

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इस शोर में ये खामोशी लिए फिरता हूँ 
हथेली पे जैसे ज़िंदगी लिए फिरता हूँ 

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तेरी नफरत कि मुझे परवाह नहीं 'मधुकर'
ये सोच कर मैं खुश हूँ कि कुछ तो हैं ... 

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तेरी कड़वाहट तुझे मुबारक दुनियां 
मैं तो मधुकर हूँ मुझे वही रहने दे ..

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अब तक हैं उन हाथों कि तपिश कायम 
राहे उल्फत में जो मधुकर से छूट गए ...

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वक्त ने काट दिए ख्वाइशों के पर वर्ना 
उड़ान अपनी भी आस्मां के पार होती .

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चला फकीरा गाँव रे 
चला वो नंगे पाँव रे 
अब तो ऎसी लगन लगी 
ना धूप लगे ना छाँव रे ...

ढल ढल के थक गया सवेरा 
घुटने लगा अंतर्मन्न मेरा 
अहसासों कि होने लगी है 
अब तो बेबस शाम रे ...

नरेश मधुकर

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जाना हैं तो हद के पार जा मधुकर 
हदों में रहकर मोहब्बत नहीं होती 

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इस शहर में हर रोज खुदा मिलता 
जब भी मिलता हैं जुदा मिलता है

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न देखा मुड़कर उन्होंने इसका गिला नहीं मुझको 
अब तक उनसा 'मधुकर' कोई मिला नहीं मुझको ...

Monday, July 15, 2013


नरेश  रघानी  मधुकर  के  कोमल  ह्रदय  से स्फुटित  कविताएँ  जो  उनकीपुस्तक ‘ज़ज्बातनामा ’ के  रूप  में  हमारे  समक्ष  आई  हैं  वह  किसी  भी  पाठक   को  एक झरने   के सदृश्य  अपने  साथ  बहा  लेने  को  सक्षम  हैं . समाज  के  कार्यों  से  जुड़े एक  कर्मठ  सेवी होने के नातेमुझे  लगा  की  शायद  कविता  उनके  बस  की  बात नहीं  होगी  लेकिन  उन्होंने  मुझको  गलत  साबित  करते  हुए  एक  से  एक  ऐसी रचनाओं  का  सृजन  किया कि बरबस  ही  मुख  से ‘ वाह ’ और 'अति सुंदरजैसेशब्द  निकल आतें हैं अपनी  समस्त  भावनाओं के  साथ  न्याय  करते  हुए  उन्होंने हमारे  सामने  एक  काव्य  रचनाओं  का  भंडार  रख  दिया  है. उनकी यह काव्यधारा अब  तक  की  जीवन  यात्रा  के  दौरान की  प्यास , थकान , प्रेमआशा-निराशादर्दऔर देशप्रेम के  अनुभवों एवं अनुभूतिओं को  समेटे उनकी इन विचारों कीअभिव्यक्तीओं को ग़ज़लकविता और शेरो -शायरी के माध्यम से पाठको तक पहुँचाने का उनका एक    प्रशंसनीय प्रयास हैपर कंही  कंही इस बात का आभासजरूर होता है कि कवि शायद निराशावादी तो नहीं पर मैं समझता हूँ कि उनमे निराशाया कुंठा कि बजाय वैरागीपन जरूर हैउनकी  कुछ  रचनाएँ  जैसे  कि  ‘ मृगतृष्णा ’, ‘सफ़र ’, रास्ता  और  दूरी ’, ‘ मदहोशी  लिए   फिरता  हूँ ’,‘  मेरे  रहनुमा ’,‘इन्दर्धनुषरातवक्तबहुत कम हैयाद तथा   और  अन्य  कवितांए   जीवन  से प्राप्त  हुए  अनुभवों  का  एक  निचोड़  है . 

एक तरफ जहाँ नरेश जी लिखते हैं :-

मैं हादसे लिखता गया  और फसाना बन गया
खुद से बाते ख़त्म की ,जज़्बात नामा बन गया....... या
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  जमीं  मिली    आसमान  मुझको 
  मिली  मंजिल    कारवां  मुझको ...........
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वंही कवि एक प्यार का दूत बन कर भी उभरता है:- .

नफरतों  से  कोई  जीत    पाया  दुनिया 
मोहब्बत  एक  बार  बेशुमार  करके  देख........ .
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कवि, देश प्रेमी होने के साथ साथ के एक दृढ निश्चयी व्यक्तिव भी हैं:

खुद  खुद मंजिल का पता जान लेते हैं    
दीवाने कर गुजरते हैं जो दिल में ठान लेते हैं
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मेरा मानना कि एक  कवि कि सफलता का राज़ उसकी सत्यवादिता एवं स्पष्टवादिताहैजज्बातनामा इसमें खरा उतरती है.  मुझको इसमें कोई संदेह नहीं कि 'जज्बातनामापाठकों को तरह तरह के  जज्बातों से रूबरू करा उनको दिलों में एक पैठ बनाने मेंकामयाब होगी..
त्रिभवन कौल
स्वतंत्र लेखककवि

Monday, July 8, 2013

चाहता हूँ




तुम को मैं सब कुछ बताना चाहता हूँ
फिर ये किस्मत अजमाना चाहता हूँ

मर ना जाऊं ऐसा मुझको डर नहीं
ज़िंदगी पर आशिकाना चाहता हूँ

जा चुका हैं दूर इतना अब वो मुझसे
मौत का मैं अब बहाना चाहता हूँ

ज़िंदगी कि कशमकश से घिरा 'मधुकर'
जीना फिर गुजरा ज़माना चाहता हूँ

खूब देखा हैं वफाओं का मैंने रास्ता 
लौट के अब घर को आना चाहता हूँ


नरेश मधुकर
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Thursday, July 4, 2013

अब मुझे किसी से प्रीत नहीं



अब मुझे किसी से प्रीत नहीं 
जीवन का कोई गीत नहीं
टूट गए वीणा के तार
अब शेष कोई संगीत नहीं

सब खोया हैं क्या पाया है
अपनों ने रंग दिखलाया हैं
ठगा गया है ऐसा मन
अब निभती कोई रीत नहीं

जाने क्या क्या कर जाते हैं
दुनियां को राह दिखाते हैं
फिर भी आदर्शो कि जग में
सदा हार हुई हैं जीत नहीं

अब मुझे किसी से प्रीत नहीं
अब मुझे किसी से प्रीत नहीं

जीवन भर नहीं पाते हैं
लुटा के सब कुछ जाते हैं
जब प्राण पखेरू उड़ जाएँ
शिलालेखों पे जी जाते है

इसीलिए मुझको यारों
ये दुनियां अब नहीं भाती हैं
छोड़ कर देव पुरुषों को जो
असुरों के पग लग जाती

तभी मैं हर क्षण कहता हूँ

बस खुद में सिमटा रहता हूँ 
कि मुझे किसी से प्रीत नहीं
अब मुझे किसी से प्रीत नहीं

जय श्री कृष्ण

नरेश मधुकर

Sunday, June 30, 2013

मदहोशी लिए फिरता हूँ ...




घने शोर में यूँ खामोशी लिए फिरता हूँ
मैं हथेली पे ज़िंदगी लिए फिरता हूँ

होश हवास तुझी को मुबारक ऐ दुनियां
मैं तो मेरी मदहोशी लिए फिरता हूँ

जाने दिल लगा के कैसे खुश हो तुम
मैं तो इक मायूसी लिए फिरता हूँ

पड़ ना ले कोई गम आँखों में मधुकर
मैं जान बूझ कर बेहोशी लिए फिरता हूँ

नरेश मधुकर

Monday, June 24, 2013

मृगतृष्णा ...




ये जीवन एक भ्रम है ... 
एक मृगतृष्णा 
जो हर पल नए नए ख्वाब दिखाती है 
सुंदर ख्वाब 
सुनहरे ख्वाब 
वो ख्वाब जो 
दरअसल होते ही नहीं
उन्हें बिखरना है 
टूटना है 
एक दिन 
फिर भी हम 
उन्ख्वाबो के पंछेयों को
पकड़ के बैठ जाते है
उन्हें तो उड़ ही जाना है
एक दिन
फिर भी बस उस एहसास कि
आदत
छूटती नहीं
एक मीठे ज़ेहर सा
ये एहसास
बस तड़प देता है
केवल तड़प
केवल अकेलापन
केवल दुःख ...

नरेश मधुकर
जय श्री कृष्ण ...